सोमवार, 22 अक्तूबर 2018

कलयुगी पिता पुत्र संवाद।


Father son conversation
पिक क्रेडिट - pixabay

पिता ने पुत्र के चरण स्पर्श किया,
और कहा - क्या आज्ञा  है मेरे लिए,
पुत्र ने कहा - हे चिरंजीव बाप,
उससे पहले की आपसे शुरू करूं वार्तालाप,
एक बीड़ी पिलवाईए, पांव जरा धीरे दबाइये,
माँ के नहीं मेरे पांव है,
पिता ने पुत्र की बीड़ी सुलगाई,
खुद भी खेंच के ऐसी दम लगाई,
की बीड़ी के प्राण पखेरू उड़ गये,
बेटे के होंठ मारे गुस्से के सिकुड़ गये,
बाप से बोला - बदतमीज ,
तूं बाप है या फजीता है,
बेटे के सामने बीड़ी पीता है,
अबे जोरू के गुलाम,
यूँ ही रोशन करेगा बेटे का नाम,
क्या जमाना आ गया है,
बाप, बेटे के सामने बीड़ी पिये,
शर्मदार बेटा कैसे जिये,
बेटा पिये तो कोई बात नहीं,
दमें का मरीज है,
ये भी कोई बाप के पिने की चीज है,
क्यों बे, कलयुग का प्रभाव तुझ पर भी पड़ गया,
मोहल्ले के आवारा बापों में रहकर बहुत बिगड़ गया,
हर हसीन बुढिया से इश्क लड़ाता है,
रिडक्शन का माल बहुत भाता है,
अब यदि किसी बुढिया को प्रेमपत्र लिखा,
मोहल्ले के आवारा बापों के साथ दिखा,
तो ऐसा टॉर्चर पहुंचाऊंगा,
तेरी हर प्रेमिका से, मैं खुद इश्क लड़ाऊंगा,
अबे माठू कैसा सीधा साधा बनके बैठा है,
जैसे कुछ जानता ही नहीं,
घर गृहस्थी का सबक याद किया,
या माँ को बुलाऊं,
माँ भी क्या करेगी?
ये मास्टर जी भी हराम की खाते हैं,
इन बापों को जाने कैसा पढाते हैं,
हम भी सोचते हैं हटाओ,
रोज-रोज कौन धमकाये,
ले दे के एक ही बाप है,
खेलने खाने के दिन है, खाये
मगर बेटे की मर्यादा तो निभाए,
हद हो गई हमारी नर्मी की,
आटा घोलकर पिये जा रहे हैं,
मगर बच्चों को जन्म दिये जा रहे हैं,
मन्दिर में सोते हैं,
राम जाने इनको बच्चे कैसे होते हैं?
बोलो तो डांटता है चुप रहो,
बच्चों का जन्मदाता तो भगवान है,
इसमें हमारा क्या योगदान है,
ये बोल-बोलकर घर भर दिया,
अपने साथ भगवान का चरित्र भी खराब कर दिया,
वह तो अच्छा हुआ,
पहला इश्क कामयाब नहीं हुआ,
सीन कुछ दिन बाद ड्राप होता,
तो आधे हिंदुस्तान का बाप होता,
सुबह शाम खाते हैं, झिड़की,
मगर जब भी खुलती है सामने वाली खिड़की,
जरुर देखते हैं,
मेरा यार छुप-छुपकर ऐसी मस्करी करेगा,
हाजी मस्तान भी क्या तस्करी करेगा,
रोज सब्जी लेने जाते हैं,
और एक बच्चे को बेचकर आते हैं,
महंगाई का ये हाल है,
उस पर ये कमाल है,
आजकल कविता करते हैं,
नायिका के नख-शिख के वर्णन पर आंहे भरते हैं,
कहते है- हे कोमलकांत पदावली,
तेरे सारे पुर्जे मिल गये, मगर कमर नहीं मिली,
खुद लापता है मगर कमर की तलाश है,
आजकल का बाप भी कितना बदमाश है,
अबे सावन के अंधे,
यथार्थ के धरातल पर आ,
फिर कल्पना की वादियों में जा लेटा,
बाप ने कहा बेटा,
इस इक्कीसवीं सदी की नालायक सभ्यता का त्रास हूँ,
दुर्भाग्य से तू मेरा बेटा,
और सौभाग्य से मैं तेरा बाप हूँ,
अतीत हमेशां वर्तमान से हारा है,
शेख मुजीब को हमेशा उसके बेटों ने मारा है।


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